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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
यांस्तान्वलवतो नित्यं मन्यसे त्वं द्विजाधम |  ६४   क
यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संय़ुगे |  ६४   ख
दुर्योधनहितार्थाय़ जय़ो दैवे प्रतिष्ठितः ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति