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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
तिष्ठेय़ुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः |  ५५   क
जय़ेदेतान्रणे को नु शक्रतुल्यवलोऽप्यरिः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति