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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी; विद्वान्क्लीवः पश्यति प्रीतिय़ोगात् |  २३   क
दाक्ष्येणाहीनो धर्मय़ुक्तो नदान्तो; लोकेऽस्मिन्वै पूज्यते सद्भिरार्यः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति