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शान्ति पर्व
अध्याय ५९
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भीष्म उवाच
दुष्टेङ्गितं च विविधं वृत्तिश्चैवानुजीविनाम् |  ५६   क
शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति