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आदि पर्व
अध्याय १३४
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वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रविश्य पुरं वीरास्तूर्णं जग्मुरथो गृहान् |  ६   क
व्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति