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शान्ति पर्व
अध्याय १३४
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भीष्म उवाच
तदस्य स्याद्वलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव वा |  ४   क
अभोग्या ह्योषधीश्छित्त्वा भोग्या एव पचन्त्युत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति