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शान्ति पर्व
अध्याय १७२
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युधिष्ठिर उवाच
केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्चरेन्महीम् |  १   क
किं च कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति परमां गतिम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति