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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
उदकं चक्रिरे चैव गाङ्गेय़स्य महात्मनः |  १७   क
विधिवत्क्षत्रिय़श्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति