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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे स चिच्छिदे |  ११   क
ध्वजं च त्वरितं छित्त्वा रथाद्भूमावपातय़त् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति