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अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
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भीष्म उवाच
पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्वन्धुः पतिर्गतिः |  ५१   क
पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति