वन पर्व  अध्याय १३४

वन्द्यु उवाच

नवैवोक्ताः सामिधेन्यः पितॄणां; तथा प्राहुर्नवय़ोगं विषर्गम् |  १५   क
नवाक्षरा वृहती सम्प्रदिष्टा; नवय़ोगो गणनामेति शश्वत् ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति