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वन पर्व
अध्याय १३४
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लोमश उवाच
तस्मिंस्तथा सङ्कुले वर्तमाने; स्फीते यज्ञे जनकस्याथ राज्ञः |  २२   क
अष्टावक्रं पूजय़न्तोऽभ्युपेय़ु; र्विप्राः सर्वे प्राञ्जलय़ः प्रतीताः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति