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वन पर्व
अध्याय १३४
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जनक उवाच
शृणोमि वाचं तव दिव्यरूपा; ममानुषीं दिव्यरूपोऽसि साक्षात् |  २९   क
अजैषीर्यद्वन्दिनं त्वं विवादे; निसृष्ट एष तव कामोऽद्य वन्दी ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति