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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्राविशत्क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः |  ४६   क
दृढैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्द्रावय़ंस्तव वाहिनीम् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति