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वन पर्व
अध्याय १३४
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वन्द्यु उवाच
महदुक्थ्यं गीय़ते साम चाग्र्यं; सम्यक्सोमः पीय़ते चात्र सत्रे |  ३६   क
शुचीन्भागान्प्रतिजगृहुश्च हृष्टाः; साक्षाद्देवा जनकस्येह यज्ञे ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति