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वन पर्व
अध्याय १३४
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वन्द्यु उवाच
यो वै दर्पात्संहननोपपन्नः; सुदुर्वलः पर्वतमाविहन्ति |  ४   क
तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्यते; न चैव शैलस्य हि दृश्यते व्रणः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति