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वन पर्व
अध्याय १३४
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अष्टावक्र उवाच
द्वाविन्द्राग्नी चरतो वै सखाय़ौ; द्वौ देवर्षी नारदः पर्वतश्च |  ८   क
द्वावश्विनौ द्वे च रथस्य चक्रे; भार्यापती द्वौ विहितौ विधात्रा ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति