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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते पाण्डवा राजन्पाञ्चालाश्च यशस्विनः |  ११   क
दृष्ट्वा कर्णं महावाहुमुच्चैः शव्दमथानदन् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति