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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिरप्यभवद्दीनस्तस्या रूपं विचिन्तय़न् |  २२   क
समय़ेन तपोऽर्धं च कृच्छ्रात्प्रतिगृहीतवान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति