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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
तांस्तु सर्वांस्तथा दृष्ट्वा धावमानान्महारथान् |  १७   क
न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति