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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा नगरकल्पं तमुद्धूतं सैन्यसागरम् |  १८   क
पिप्रीषुस्तव पुत्राणां सङ्ग्रामेष्वपराजितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति