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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
शरवर्षं तु तत्कर्णः पार्थिवैः समुदीरितम् |  २१   क
शरवर्षेण महता समन्ताद्व्यकिरत्प्रभो ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति