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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
शिरोभिः पतितै राजन्वाहुभिश्च समन्ततः |  २७   क
आस्तीर्णा वसुधा सर्वा शूराणामनिवर्तिनाम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति