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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
आचार्ये निहते द्रोणे धृष्टद्युम्नेन संय़ुगे |  १०   क
निहते वज्रहस्तेन यथा वृत्रे महासुरे ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति