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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
युध्यतेऽसौ रणे कर्णो दंशितः सर्वपार्थिवैः |  ३०   क
पश्यैतां द्रवतीं सेनां कर्णसाय़कपीडिताम् |  ३०   ख
कार्त्तिकेय़ेन विध्वस्तामासुरीं पृतनामिव ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति