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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
आय़ान्तं पाण्डवं दृष्ट्वा गजः प्रतिगजं यथा |  ३८   क
असम्भ्रान्ततरः कर्णः पर्त्युदीय़ाद्धनञ्जय़म् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति