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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम् |  २८   क
व्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति