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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः |  ३१   क
सम्यक्प्रवृत्तान्पुरुषान्न सम्यगनुपश्यतः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति