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उद्योग पर्व
अध्याय ४२
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सनत्सुजात उवाच
श्रीः सुखस्येह संवासः सा चापि परिपन्थिनी |  ३१   क
व्राह्मी सुदुर्लभा श्रीर्हि प्रज्ञाहीनेन क्षत्रिय़ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति