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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
अद्य वाणमय़ं वर्षं सृजतो मम धन्विनः |  ५७   क
जीमूतस्येव घर्मान्ते द्रक्ष्यन्ति युधि सैनिकाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति