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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
जेष्याम्यद्य रणे पार्थं साय़कैर्नतपर्वभिः |  ५८   क
तिष्ठध्वं समरे शूरा भय़ं त्यजत फल्गुनात् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति