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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
मातुलेनैवमुक्तस्तु द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः |  ६८   क
दुर्योधनमिदं वाक्यं त्वरितं समभाषत ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति