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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा |  ११८   क
यय़ा निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लव्धचेतसम् ||  ११८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति