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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च; तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |  १७   क
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता; द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेय़म् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति