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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽपि रथिनां श्रेष्ठश्चापमुद्यम्य वीर्यवान् |  ९   क
कौरवाग्र्यैः परिवृतः शक्रो देवगणैरिव |  ९   ख
पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्ववाहुवलमाश्रितः ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति