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आदि पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
पुरोचनभय़ाच्चैव व्यदधात्संवृतं मुखम् |  १८   क
स तत्र च गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति