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आदि पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते साय़ुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप |  १९   क
दिवा चरन्ति मृगय़ां पाण्डवेय़ा वनाद्वनम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति