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आदि पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
शुचिमाप्तं प्रिय़ं चैव सदा च दृढभक्तिकम् |  ८   क
न विद्यते कवेः किञ्चिदभिज्ञानप्रय़ोजनम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति