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आदि पर्व
अध्याय १०१
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वैशम्पाय़न उवाच
स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः |  २१   क
स तेन तपसा लोकान्विजिग्ये दुर्लभान्परैः |  २१   ख
अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु कथ्यते ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति