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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
दूरगं वहुधागामि प्रार्थनासंशय़ात्मकम् |  ३६   क
मनः सुनिय़तं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति