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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः |  १०४   क
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वाय़ुवाहनः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति