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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
नैवङ्गते सौमकिरद्य राजा; सन्तापमर्हत्यसुखाय़ कर्तुम् |  २५   क
कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः; स चापि सम्पत्स्यति पार्थिवस्य ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति