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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च |  १२६   क
अचलां श्रिय़माप्नोति श्रेय़श्चाप्नोत्यनुत्तमम् ||  १२६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति