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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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वैशम्पाय़न उवाच
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः |  ३   क
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारवन्धनात् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति