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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
तमेव चार्चय़न्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् |  ५   क
ध्याय़न्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति