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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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शल्मलिरु उवाच
मम तेजोवलं वाय़ोर्भीममपि हि नारद |  २४   क
कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति