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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
तेजो वृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः |  ९४   क
प्रग्रहो निग्रहोऽव्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति