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द्रोण पर्व
अध्याय ११९
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सञ्जय़ उवाच
न ज्ञातिमवमन्यन्ते वृद्धानां शासने रताः |  २३   क
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः |  २३   ख
जेतारो वृष्णिवीराणां न पुनर्मानुषा रणे ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति