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वन पर्व
अध्याय १३५
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लोमश उवाच
सुसमिद्धे महत्यग्नौ शरीरमुपतापय़न् |  १७   क
जनय़ामास सन्तापमिन्द्रस्य सुमहातपाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति