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वन पर्व
अध्याय १३५
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लोमश उवाच
अलक्ष्म्या किल संय़ुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः |  २   क
आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गाय़ां व्यमुच्यत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति